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Tuesday, March 7, 2023

इस धरती के अंदर लिपटे हुए हम

 
इस धरती के अंदर लिपटे हुए हैं हम।

कभी न छोडेंगे इसको। जान देंगे हम। 

यह हमारी धरती है इसको बचाएंगे हम। 

प्लास्टिक का बहिष्कार करेंगे हम। 

पर्यावरण को स्वच्छ बनाएँगे हम।

पेड़ पौधे लगाएँगे हम।

इस धरती का नाम रोशन करेंगे हम।


गरम हो रहा है

धरती का गोला,

छलनी-छलनी हो रही है

आसमान की छतरी।

इन्हें बचाएँगे हम।

साफ ऊर्जा अपनाएँगे हम।

नदियों-झीलों को सरसाएँगे हम।

फिर से हरियाली की बहार लाएँगे हम।

अपनी छहों ऋतुओं को जिलाएँगे हम। 


इस धरती में लिपटे हैं हम।

इसे जान से ज़्यादा प्यार करेंगे हम।

यह हमारी माता है,

इसे नहीं रुलाएँगे हम।

अपनी प्रकृति माता को  

बचाएँगे हम।

Thursday, May 26, 2022

सुंदर परी




मैं हूँ सुंदर परी

मैं हूँ सुंदर परी


चाँद-तारों से मैं ना डरी

मैं हूँ सुंदर परी


चाँद देखे मुझे

शर्माए देखके मुझे

मैं हूँ सुंदर परी


मैं उडूँ आकाश में 

लेके तारों की तश्तरी

मैं हूँ सुंदर परी


इंद्रधनुष सजा देती

मेरी जादू की छड़ी

मैं हूँ सुंदर परी


तैरती बादलों पर 

खड़ी खड़ी घड़ी घड़ी

मैं हूँ सुंदर परी


मैं हँसी तो फुलवारी

फूलों से भरी

मैं हूँ सुंदर परी


मेरे आँचल से देखो

उजाले की बूँदें झरी

मैं हूँ सुंदर परी


तुमको छूकर बना दूँ

बाँसुरी सुनहरी

मैं हूँ सुंदर परी


सबपे दया करो

बनो मुझ-सी सुंदरी

मैं हूँ सुंदर परी

🌼 - साहिती

Sunday, June 13, 2021

मैं पंछी बनूँ



पंछी बनूँ उड़ती फिरूँ 
मस्त गगन में 

आज मैं कैद हूँ 
घर के पिंजड़े में 

हमें आजाद करो 
इस घर के पिंजड़े से 
अब इस कोरोना ने 
जीना  मुश्किल कर दिया 

हम कैसे जिएँगे बंद पिंजड़े में 
गगन में उड़ना है आजाद होकर 
मैं पंछी बानू उड़ती फिरूँ 
मस्त गगन में 

यह ठीक है कि मास्क लगाके उड़ना पड़ेगा 
पर अब और कैद मंजूर नहीं है 
इसीलिए पंछी बनूँ उड़ती फिरूँ 
मस्त गगन में !
… मस्त मगन में !

- साहिती 
 

चंदा मामा आओ रे !



चंदा मामा आओ रे!

मुझसे गप्पे लड़ाओ रे 

सबके चहरों पे हँसी लाओ रे 

चन्दा मामा आओ रे 


काली काली रात को 

रोशनी से भरो रे 

मीठी मीठी नींद में 

सुनहरे अपने दिखाओ रे 


चंदा मामा आओ रे!! 


-साहिती 

Sunday, January 17, 2021

प्रदूषण



प्रदूषण ....
            प्रदूषण .... 
प्रदूषण हटाओ 
भारत को बचाओ 

स्वच्छ भारत अभियान करो 
भारत को साफ़ करो 

फ़ैक्टरी को दूर बनाओ 
जहाँ कोई रहता नहीं 

बिना धुएँ का ईंधन जलाओ 
वायुमंडल स्वच्छ बनाओ 

पेड़ लगाओ पेड़ लगाओ 
पर्यावरण को स्वस्थ बनाओ 

प्रदूषण हटाओ 
प्रदूषण हटाओ 


- वुल्ली श्री साहिती 
पाँचवी 'स' 
केंद्रीय विद्यालय नं 1 गोलकोंडा
हैदराबाद

Wednesday, November 4, 2020

कोरोना मैया






 कल रात मैंने एक सपना देखा

सपने में कोरोना मैया को देखा 


वे मुस्कुराकर कहने लगी

मैं भी जरा देख लूँ

तुम हाथ कैसे मिलाओगी? 

तुम गले कैसे लगाओगी? 

तुम सबके साथ कैसे मिलकर त्योहार मनाओगी? 


तो मैंने कहा 

हे कोरोना मैया 

देख लो तुम भी 


मैं gloves पहनकर हाथ मिलाऊँगी

में social distance maintain करके दोस्तों के साथ खेलूँगी

और त्योहार भी मनाऊँगी


मैं mask पहनकर घूमने भी जाऊँगी जहाँ भीड़ न हो 

मैं अध्यापकों और दोस्तों के साथ मिलकर ऑनलाइन पढूँगी


हम नहीं डरेंगे 

आपका सामना करेंगे


मेरी बात सुनकर 

कोरोना मैया भाग गई। 


- साहिती, कक्षा 5 'स'

केंद्रीय विद्यालया नं 1 गोलकोंडा



Sunday, January 25, 2015

सूँ साँ माणस गंध

सूँ साँ माणस गंध / ऋषभदेव शर्मा/
ISBN : 978-93-5104-234-1
श्रीसाहिती प्रकाशन, 303 मेधा टॉवर्स,
राधाकृष्ण नगर, अत्तापुर
हैदराबाद - 500 048
मूल्य : 300
प्रथम संस्करण : 2013

कविता के लिए 

- डॉ. देवराज 

कविता से गायब होते आदमी, पेड़, मौसम, गाँव और देश की खोज में दिन-रात जंगल के एक छोर से दूसरे छोर तक दौड़ते सपनों की भाषा रचने की कोशिश में जुटे कवि की अभिव्यक्ति ‘सूँ साँ माणस गंध’ में बसी है| इन कविताओं में कहीं एक जिजीविषा है, जो अकेले ही दूर-दूर तक फैले युद्ध के खिलाफ खड़ी है| उसकी आवाज़ में काल और परिस्थितियों के मलिन तर्कों के सूखे-उजाड़ खेतों में पड़ी दरारों से सवाल करने की भरपूर ताकत है| वह पहाड़ और घाटी के बीच पनपे अपनापे को अपने छोटे-छोटे शावकों की नन्हीं-नन्हीं चोंचों में दानों की शक्ल में रखती चिड़िया के साथ मनुष्य को बचाए रखने के संघर्ष में शामिल है| उसके साथियों में सबसे ताकतवर घास का वह सूखा तिनका है, जिसे एक किसान इसलिए गुड़ खिलाना चाहता है कि उसके घुटनों में कड़ापन आए और वह अपने पैरों पर खड़ा होकर कुछ दूर तलक चल सके| जाड़े, गर्मी और बरसात को सिर हिला-हिला कर पढ़ती हुई भूख भी इसी की सहचरी है, इसीलिए तहखानों से आने वाली हवाएँ इसे देखते ही भयभीत हो उठती हैं| कवि ने इसे अर्जित नहीं किया है| यह उसकी दाद-इलाही है, इसीलिए वह इसे कभी महसूस नहीं करता, जबकि शुरू से इसी के सहारे जिए चला जा रहा है| उसकी ये कविताएँ ऐसे ही जीवन के साथ आत्मीयता भरा रिश्ता जीने को कह रही हैं| निर्णय हमें करना है, कविताओं को नहीं, कवि को भी नहीं!...........

इन कविताओं में कहीं एक विश्वास है, जो परीलोक से नहीं आया है, बादलों के पानी की तरह इसी धरती पर बरस कर चीह्नी-अनचीह्नी आकृतियों के पाँवों में चुपचाप लिपट गया है| उसे ऐसे पत्तों की तलाश है, जिनके हाथों में अपने ही समय को अंधा बनाने के लिए साजिशें इंतज़ार न कर रही हों| वह सदियों से यहाँ-वहाँ घूम रहा है, मगर उसकी आँखों का खालीपन अभी तक पूरी तरह रीता नहीं है| उसे एक के बाद एक अनगिनत सवाल परेशान कर रहे हैं| वह किसी खरगोश का साथ देना चाहता था, मगर अब उसे ही मार डालने की सोचने लगा है| इस बदलाव से जो सवाल पैदा होता है, उसकी शक्ल बेहद परेशान करने वाली है, फिर भी वह उसका सामना करते रहने को तत्पर है| नया साल, जनतंत्र, छब्बीस जनवरी, संक्रांति, देश, प्रभात, जीवन, मृत्यु जैसी असंख्य ध्वनियाँ कभी-कभी उसे अपनी नसों में तेजी से बहती हुई अनुभव होती हैं| इनके साथ झरनों की तरह आकाश को चुनौती देते हुए वह किसी मुक्ति-पर्व को संभव बनाना चाहता है| उसकी यह इच्छा फिर से सवालों के शोर में कोहरे की बौखलाहट से घिर जाती है| कवि की बेचैनी लगातार करवटें बदल कर असहनीय दर्द में तब्दील होती रहती है| उसकी नींद कभी रात से और कभी दिन से रिश्ता जोड़ कर अपने को बचाए रखने में जुट जाती है| कवि के सवाल न नींद से आँखें चुराते हैं और न दर्द से| यह हमेशा से इतिहास के अपारिभाषेय होने की त्रासदी है| यह कब तक केवल कवि को अभिशापित करती रहेगी? हमारे पास तक इसके जलते मांस की चिड़ायंध भी कभी पहुंचेगी या नहीं? सावधान हमें हो जाना है, इससे पहले कि हममें से किसी को या फिर सभी को पिंजरे में बंद करके चूहे की मौत दे दी जाए और पूँछ पकड़ कर नालियों के किनारे फेंक दिया जाए|...........

इन कविताओं में एक रचना जगदीश सुधाकर के लिए भी है| यह दोस्त के लिए और उससे कहीं अधिक अपने लिए दोस्त की तलाश है, शायद इसी कारण इसमें दोस्त कहीं दिखाई नहीं देता, उसकी तब्लक बत्तीस हर जगह मौजूद है| दोस्त भी तब्लक बत्तीस में ही है, वहाँ खतौली की सडकों पर देर रात तक यों ही घूमते हुए हम सब दोस्तों की पूरी दुनिया है| वहीं एक किसान है, जिसने सन तिरासी की अठारह जनवरी को खेत में अन्य किसानों के बीच कविता पढ़ने के बाद खुश होकर इस संग्रह के कवि को पाँच रुपए का नोट अपने फटे कुर्ते की जेब से या पता नहीं, धोती की फेंट से निकाल कर वार-फेर की शैली में दिया था| याद आ रहा है कि उस किसान ने एक दूसरे कवि की कविता में लाजो के उरोजों को पसंद नहीं किया था| वह दूसरा कवि शहराती भदेसपन का घोर बीमार था और सोचता था कि बेपढ़ा किसान लाजो का नाम आते ही फड़क उठेगा, मगर वैसा कुछ नहीं हुआ| कविता की समालोचना का यह किसानी मूर्त रूप किसी साहित्य-कुंभ में कभी दिखाई नहीं दिया| एक किसान ब्रेंडेड-समालोचकों के लिए आज तक चुनौती बना हुआ है, कविता में, आलोचना में और सच कहा जाए, तो जीवन में भी| जगदीश सुधाकर भी जन-कवि के रूप में चुनौती ही हैं, अपनी संपूर्ण भावुकता और गुस्से के बावजूद एक अटल चुनौती..........

यह कवि अपनी कविता के माध्यम से हर बार एक नई हवा लेकर सामने आता है| इस बार इस हवा में लोक-जीवन की भाषा का हस्तक्षेप पहले से कहीं अधिक है| कविता में ऐसी बेलौस और निजी भाषा का लौटना हमारी जातीय चेतना के लिए शुभ संकेत है|........

29 जून, 2013 
-देवराज 
अधिष्ठाता, 
अनुवाद एवं निर्वचन विद्यापीठ,
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय,
गांधी हिल्स, वर्धा – 442 005

Sunday, November 23, 2014

धूप ने कविता लिखी है

ऋषभदेव शर्मा के सातवें कविता संग्रह 'धूप ने कविता लिखी है' (२०१४) का
लोकार्पण करते हुए पद्मश्री जगदीश मित्तल (दाएँ से तीसरे).
साथ में दाएँ से - विवेक नाबाम, प्रो. एन. गोपि, प्रो. एम. वेंकटेश्वर,
डॉ. जोराम यालाम नाबाम, प्रो. ऋषभदेव शर्मा, लिपि भारद्वाज,
कुमार लव, डॉ. पूर्णिमा शर्मा और डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा.


हैदराबाद १५ नवंबर २०१४. 

यहाँ 'साहित्य मंथन' द्वारा दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के सम्मलेन कक्ष में प्रो. एम. वेंकटेश्वर की अध्यक्षता में आयोजित एक समारोह में कवि ऋषभदेव शर्मा के सातवें कविता संग्रह 'धूप ने कविता लिखी है' को लोकार्पित किया गया. लोकार्पण विश्व विख्यात कला संग्राहक और समीक्षक पद्मश्री जगदीश मित्तल ने किया. इस अवसर पर पुस्तक के भूमिका लेखक प्रो. देवराज के अतिरिक्त अरुणाचल प्रदेश से आए हुए विवेक नाबाम और डॉ. जोराम यालाम नाबाम ने शुभकामनाएँ व्यक्त कीं.प्रसिद्ध तेलुगु साहित्यकार प्रो. एन. गोपि ने आशीर्वचन दिए. पुस्तक की लोकार्पित प्रति युवा कवि कुमार लव और फोटोपत्रकार लिपि भारद्वाज ने स्वीकार की. 
उल्लेखनीय है कि 'धूप ने कविता लिखी है' में ऋषभदेव शर्मा की १२६ तेवरियाँ संकलित हैं. स्मरणीय है कि उन्होंने तेवरी काव्यांदोलन का प्रवर्तन १९८१ में किया था और १९८२ में प्रो. देवराज ने इसका घोषणापत्र तैयार किया था. तदुपरांत प्रथम तेवरी संकलन (तेवरी) की भूमिका के अंतर्गत इन दोनों तेवारीकारों (डॉ. देवराज और ऋषभदेव शर्मा) ने तेवरी काव्यांदोलन की आधिकारिक घोषणा की थी. 'धूप ने कविता लिखी है' में इन दोनों दस्तावेजों (घोषणापत्र और आधिकारिक घोषणा) का भी समावेश किया गया है. साथ ही तेवरी काव्यांदोलन के उद्भव और विकास पर भी एक शोधपरक आलेख सम्मिलित है. 

'धूप ने कविता लिखी है' (२०१४) की भूमिका तेवरी काव्यांदोलन के घोषणापत्र के लेखक डॉ. देवराज ने लिखी है और उसे शीर्षक दिया है - 'कल धमाके में मरा जो, कौन था.......' इस भूमिका को यहाँ अविकल रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है - 



कल धमाके में मरा जोकौन था.........
प्रो. देवराज 
धूप ने कविता लिखी है / ऋषभदेव शर्मा/ २०१४/ श्रीसाहिती प्रकाशन, हैदराबाद
पृष्ठ - १६८/ मूल्य - रु. २००/ ISBN - 978-93-5174-509-9 
तेवरी आंदोलन को प्रारंभ हुए तीन दशक से अधिक बीत चुके हैं। इस अवधि में हिंदी का यह काव्यांदोलन इतिहास की पुस्तकों में तो अपनी जगह नहीं बना पाया, लेकिन इससे जुड़े रचनाकारों ने अपनी आवाज़ को किसी प्रकार के समझौते नहीं करने दिए। उन्होंने प्रारंभ में जिस तरह नगरों, गाँवों, सड़कों और खेतों से जुड़ाव घोषित किया था, वह कम नहीं हुआ। इस समय वे जहाँ-जहाँ हैं, अपने चारों ओर फैली विषाक्त हवाओं के विरुद्ध अवसर निकाल-निकाल कर आवाज उठा रहे हैं। कई बार इनकी आवाज़ें दूर तक अपनी गूँज का विस्तार करती महसूस की जाती हैं और कई बार उन्हें अनसुना कर दिया जाता है। यह तरह-तरह की सत्ताओं का प्रतिरोध की कविता के साथ किया जाने वाला व्यवहार है, जो हमेशा से होता आया है। तेवरी आंदोलन से जुड़े रचनाकार इस तथ्य को जानते हैं, इसीलिए वे सत्ता को निरंतर नकारते हैं और जनता की सही आवाज़ बनने के रास्ते तलाशते रहते हैं। उनकी संख्या कम है, और कम होती चली जाए, उनके साथ आने से सुविधाजीवी रचनाकार कतराते रहें या और जो भी हो, उनकी बला से। 

ऋषभदेव शर्मा के लिए भी सत्ता नाराज़ हो जाए, उनकी बला से, वे जनाक्रोश का पसीना पोंछ-पोंछ कर उसे उकसाते रहेंगे और मौक़ा मिलते ही जनांदोलन में बदल जाने को प्रेरित करते रहेंगे। उनके लिए सत्ता ख़ूबसूरत से ख़ूबसूरत रूप धारण करने की कोशिश करके लगातार भ्रमबिंबों का एक जाल रचती रहती है। इस जाल में असंख्य सूर्य, चंद्रमा, तारे, धरा-गोलार्ध, आपस में गड्ड-मड्ड हुए उल्टे-सीधे चक्कर काटते रहते हैं, ज्वालामुखियों से लावे की जगह बर्फ फूट-फूट कर पहाड़ों-जंगलों से उनकी असली पहचान छीनने की साजिश रचती रहती है और स्थानीयता से वैश्विकता के बीच का शोर विमर्शों की दलदल में बदलता रहता है। भ्रमबिंबों के इस जाल का शिकार भी जनता होती है और उत्तर भी वही बनती है। यहाँ से सत्ता, जनता और रचनाकार के रिश्तों का अग्नि-मार्ग निर्मित होता है, जिस पर चलना सत्ता के लिए कभी संभव नहीं होता, जबकि शेष दोनों सहयात्री बन कर आगे बढ़ते रहते हैं। 

‘धूप ने कविता लिखी है’ की तेवरियाँ मुझे इस अहसास के सामने लाकर खड़ा करती हैं। इनकी आँच को सहना मेरे लिए कठिन है। ये कभी भी, कहीं भी जला सकती हैं। किसी भी बिंदु पर असहज कर देने वाले सवालों के दायरे निर्मित करके मुझे उनके भीतर खींच सकती हैं। मुझे लगता है कि अगर आपने इन्हें एक से अधिक बार पढ़ने की हिम्मत दिखाई, तो आप भी इनके आसान शिकार बन सकते हैं, सो इन तेवरियों को अधलेटे होकर या बिस्तर पर चादर ओढ़ कर या मन समझाने के लिए न पढ़ें। इन्हें वे लोग भी न पढ़ें, जिनकी रीढ़ की हड्डी सीधी न हो और जो सत्ता की दलाली को जीवन-ध्येय बना चुके हों। जनता की पक्षधरता का हलफ उठाने वाले इन तेवरियों को पढ़ते हुए सहजता अनुभव करेंगे। उन्हें इनके संगसाथ में संघर्ष के नए रास्ते भी आवाज़ लगाते दिख जाएँगे। 

ऋषभदेव शर्मा के इस नए संग्रह की अधिकांश तेवरियाँ बरसों पहले रची गई हैं और शहरी गोष्ठियों से लेकर गंगधाडी के आसपास खलिहानों में किसानों की प्रशंसा बटोर चुकी हैं। किताब में इन्हें देर से जगह मिल रही है, इसके पीछे तेवरीकार का संकोच है या कुछ और, यह केवल रचनाकार को ही पता है। मेरे लिए यह संग्रह संतोष का बड़ा कारण इसलिए है कि इसके प्रकाशन से तेवरी काव्यांदोलन को पुनर्वार नवीन ऊर्जा प्राप्त होगी। 

शुभकामनाएँ................ 
विजयादशमी, 2014                                                                                                                                                                                                                                         देवराज
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय 
गांधी हिल्स, वर्धा-442 005 (महाराष्ट्र)